जीवन परिचय

लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी – जीवन परिचय

राजनीतिक और सामाजिक जीवन परिचय

लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी : प्रारम्भिक काल खंड [ १९०८ – १९३० ] 

उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल, अतीत की जकड़न में लगभग निष्पंद पूर्वांचल, अपने महिमा मंडन के लिए उधार के महापुरुषों की खोज में निरंतर प्रयासरत पूर्वांचल सदा सर्वदा कुछ कुछ नामों पर आकर ठहर जाता है। देवरहा बाबा पूर्वांचल के शीर्ष पुरुष हैं। शायर फ़िराक़ गोरखपुरी और चित्रकार अमृता शेरगिल, समाज सेवी बाबा राघव दास तथा पूर्व प्रधान मंत्री चंद्रशेखर कुछ अन्य नाम हैं जिनके ऊपर पूर्वांचल का कुंठित समाज गर्व का अनुभव कर लेता है। अगर पूरे पूर्वांचल की यह स्थिति है तब देवरिया जनपद की क्या स्थिति होगी इसकी  कल्पना की जा सकती है।

देवरिया की आत्मश्लाघा की यात्रा देवरहा बाबा से आरंभ होकर बाबा राघव दास पर आकर थम जाती है। लेकिन अगर हम अतीत में झांकने का थोड़ा प्रयास करें तो देवरिया के ऐसे अनेक व्यक्तियों और व्यक्तित्वों के दर्शन होंगे जिन्होंने समय की शिला पर अपने हस्ताक्षर अंकित कराए हैं। यह अन्य बात है कि समय की धूल ने उन नामों को धुंधला कर दिया है और इसीलिए आजकल की पीढ़ी उनके नाम से अपरिचित है। इन्हीं में से एक नाम श्री लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी का है।

उनका जन्म १६ मई १९०८ में ग्राम सोनबरसा – तहसील सलेमपुर , ज़िला देवरिया [ तत्कलीन गोरखपुर ] के एक कृषक परिवार में हुआ था।
उन्होंने १९२२ में किंग एडवर्ड हाई स्कूल देवरिया [ वर्तमान राजकीय इण्टर कॉलेज, देवरिया ] से हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था।
इसी वर्ष १४ वर्ष की अवस्था में उन्होंने विद्यालय भवन पर लहराते यूनियन जैक को उतार कर फेंक दिया और तिरंगा लहरा दिया। अँग्रेज़ पुलिस अधीक्षक ने उन्हें गोली मारने का आदेश मांगा  किन्तु जिला मजिस्ट्रेट रघुबर दयाल द्वारा ऐसा करने से रोक दिया गया। रघुबर दयाल ने इसे बचपने की शरारत [ childhood prank ] बता कर कहा कि तिरंगा उतार दिया जाए, यूनियन जैक पुनः फहरा दिया जाए और लड़के को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए। अंग्रेज़ पुलिस अधीक्षक दांत पीसता रह गया। लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी के प्राण तो अवश्य बच गए किन्तु रघुवर दयाल की प्रोन्नति रोक दी गई। उन पर आरोप लगाया गया कि वह स्वतंत्रता सेनानियों से सहानुभूति रखते हैं। बाद में वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बन कर सेवा निवृत्त हुए।
इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी ने १९२४ में प्रयागराज [ तत्कालीन इलाहाबाद ] विश्वविद्यालय में  बी. एससी . करने हेतु प्रवेश लिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ छात्रों द्वारा व्यंग्योक्ति के रूप में पूर्वांचल के छात्र समुदाय को “बलियाटिक” कहे जाने पर प्रतिक्रिया स्वरूप १९२५/२६ में प्रयागराज [ तत्कालीन इलाहाबाद ] विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीता भी। तत्पश्चात १९२६ में प्रयागराज [ तत्कालीन इलाहाबाद ] विश्वविद्यालय से बी. एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। १९२६ में उन्होंने प्रयागराज [ तत्कालीन इलाहाबाद ] विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया। और परीक्षा में पूरे विश्व विद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया।
उन्होंने १९२८ में मुंसिफ की परीक्षा उत्तीर्ण की किन्तु CID ने उनके विरुद्ध नकारात्मक रिपोर्ट दी। CID ने देवरिया राजकीय विद्यालय भवन पर लहराते यूनियन जैक को उतार कर फेंक देने और तिरंगा लहरा देने का उल्लेख करते हुए उन्हें राष्ट्रवादी घोषित कर के सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य ठहरा दिया। उस समय उनके पिता और परिवार के अन्य सदस्य उनके ऊपर क्रोधित हुए लेकिन उस समय दुर्भाग्य पूर्ण लगने वाला यह प्रकरण आगे चलकर वरदान सिद्ध हुआ। अगर वह मुंसिफ़ हो जाते तो १९५२ से १९७४ तक का उनका उल्लेखनीय सार्वजनिक जीवन कभी भी आरंभ नहीं हो सकता था। अधिक से अधिक वह ज़िला न्यायाधीश बन कर सेवा निवृत्त हो जाते।
मुंसिफ़ बनने का अवसर गंवा देने के बाद उन्होंने १९३० में गोरखपुर ज़िला दीवानी न्यायालय  में वकालत आरम्भ कर दिया। यहां उन्होंने १९३० से १९५२ तक सफलता पूर्वक वकालत किया। उर्न्होने एक विशाल भवन का निर्माण कराया और परिवार के साथ सुखमय जीवन व्यतीत करने लगे।
लेकिन समय का कभी न रुकने वाला हाथ उनके भाग्य चक्र में कुछ और अनजानी, अनदेखी रेखाएं बनाने में लगा हुआ था।
देवरिया को पृथक ज़िला बनाने की घोषणा तो पहले ही हो चुकी थी। सरकार ने १९५२ में दीवानी कचहरी को भी गोरखपुर से देवरिया स्थानांतरित करने का निर्णय घोषित कर दिया। लक्ष्मी कान्त जी दुविधा में पड़ गए कि देवरिया चलें या गोरखपुर में ही बसे रहें। सफल वकालत और सद्यः निर्मित विशाल भवन छोड़ कर एक अनिश्चित भविष्य में प्रवेश करने का निर्णय सरल नहीं था। किन्तु बाल्मीकि रामायण के एक श्लोक ने उन्हें मार्ग बताया :
अपि स्वर्णमयी लंका, न मे लक्ष्मण रोचते, 
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। 
सब कुछ छोड़कर वह अपनी जन्मभूमि देवरिया आ गए। और १९५२ से १९७४ तक देवरिया दीवानी न्यायालय में वकालत करते रहे। श्री विश्वनाथ पाण्डेय और श्री नन्हें चिश्ती के साथ श्री लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी की त्रिमूर्ति देवरिया न्यायालय के इतिहास में एक किम्वदन्ती के रूप में जानी जाती है।
यह संयोग ही है कि उनका गोरखपुर का कार्यकाल २२ वर्षों का था [१९३० – १९५२]। और देवरिया का कार्यकाल भी २२ वर्षों का ही रहा [ १९५२ – १९७४]।
 

लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी : राजनीति काल खंड [ १९५२ – १९७४ ] 

उत्तर दिशि बहि सरजू पावन,
अवधपुरी मम परम सुहावन।।
देवरिया ही उनकी अवधपुरी थी। यहीं रहते हुए वह १९५२ में नानाजी देशमुख [ तत्कालीन संगठन महामंत्री उत्तर प्रदेश जनसंघ – अब भारत रत्न से सम्मानित ] की प्रेरणा और आशीर्वाद सेे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कालान्तर में भारतीय जनसंघ में सक्रिय हुए।
नाना जी के कहने पर उन्होंने १९५२ में देवरिया से लोक सभा का और खड्डा , जिला देवरिया से विधान सभा का चुनाव एकसाथ लड़ा । पराजय सुनिश्चित थी लेकिन नवनिर्मित दल को चुनाव आयोग से मान्यता दिलाने का लक्ष्य था। इसलिए भारत रत्न नाना जी देशमुख के आदेश को शिरोधार्य कर के उन्होंने चुनौती स्वीकार कर लिया।
१९५७ के आम चुनाव में उन्होंने सलेमपुर , जिला देवरिया से विधान सभा का चुनाव लड़ा ।
१९५८ में भारतीय जनसंघ के खाद्य आंदोलन के सत्याग्रही के रूप में उन्होंने भाग लिया और देवरिया कारागार में बंदी रहे। फलस्वरूप उनकी अत्यधिक सफल वकालत को क्षति भी पहुंची लेकिन उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया।
कारागार से मुक्त होने पर नाना जी की योजना अनुसार उन्हें १९५९ में भारतीय जनसंघ के बरेली अधिवेशन में उत्तर प्रदेश जनसंघ का प्रांतीय अध्यक्ष चुना गया। वह देवरिया के प्रथम व्यक्ति थे जो भारतीय जनसंघ के प्रदेश स्तर के नेताओं की पंक्ति में सम्मिलित हुए।
तत्पश्चात उन्होंने १९६२ में उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनावों में गोरखपुर से विधायक का चुनाव लड़ा। भारतीय जनसंघ का व्यापक आधार न होने के कारण और नया क्षेत्र होने के कारण यहां भी उनकी पराजय हुई। लेकिन उन्होंने १८३४७ मत प्राप्त किया और द्वितीय स्थान पर रहे।
 
१९६७ में पुनः एक बार नाना जी के आदेश पर वह देवरिया से उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनावों में विधायक का चुनाव लड़े। यह उनके जीवन का अंतिम चुनाव था। पंद्रह वर्षों में पांच चुनाव और सब में पराजय। आलोचक और विघ्न संतोषी उन्हें एक असफल राजनीति व्यक्ति मान सकते हैं। लेकिन वह पद के लिए नहीं लड़ रहे थे। उनका उद्देश्य भारतीय जनसंघ की नींव को सुदृढ़ करना था।
 
सज रहा है मातृ मंदिर मैं नहीं पूजा बनूंगा,
और चित्रित भित्तिका है मैं नहीं वह स्थान लूंगा,
नींव का बस एक पत्थर धूल का मैं एक कण हूं,
पूज्य मां की अर्चना का एक छोटा उपकरण हूं।।
लेकिन दल के लिए की गई उनकी सेवाओं को ध्यान में रखते हुए नाना जी देशमुख ने उन्हें १९६७ में नगर पालिका परिषद देवरिया के अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशी बनाया। वह नगर पालिका परिषद देवरिया के अध्यक्ष चुने गए। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि उनके पिता स्वर्गीय श्री कुंज बिहारी चतुर्वेदी भी १९३० में देवरिया नगर पालिका के सचिव रह चुके थे।
 
श्री लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी को देवरिया नगर पालिका के जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त है। इस पद पर वह मात्र दो वर्ष [ १९६७ से १९६९ तक ] तक ही रह पाए। उनका कार्यकाल आज भी भ्रष्टाचार मुक्त कार्यकाल के रूप में जाना जाता है।
 
अब प्रारंभ होता है उनके जीवन का लंका काण्ड। वह एक बार लोकसभा और चार बार विधानसभा अर्थात पांच बार चुनाव लड़ चुके थे। वह भारतीय जनसंघ के तृतीय प्रदेश अध्यक्ष और प्रथम नगर पालिका अध्यक्ष थे। राष्ट्रीय स्तर के नेता उनके ही घर पर आकर रुका करते थे। इनमें प्रमुख थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प० पू० माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरु जी , भारतीय जनसंघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री दीनदयाल उपाध्याय, प्रदेश संगठन मंत्री श्री नाना जी देशमुख, भारतीय मज़दूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी और श्री अटल बिहारी वाजपेई [ तत्कालीन अखिल भारतीय अध्यक्ष – बाद में प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित ]
 
इसके अतिरिक्त भारतीय जनसंघ के अन्य अखिल भारतीय अध्यक्ष श्री प्रेम नाथ डोगरा [ १९५५ ] , श्री पीताम्बर दास [ १९६० ] , श्री बच्छ राज व्यास [ १९६५ ] , श्री बलराज मधोक [ १९६६ ] और कर्नाटक केसरी जगन्नाथ राव जोशी भी अनेक बार उनके घर पर टिक चुके थे।
उनकी अपार लोकप्रियता और प्रदेश व्यापी ख्याति को न सह सकने और जलन के कारण जनसंघ के ही दो पालिका सदस्यों ने विपक्षी दल के सदस्यों से मिलकर अविश्वास प्रस्ताव पारित कर उन्हें पद से हटा दिया। इस प्रकार भारतीय जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष का कार्यकाल मात्र दो वर्षों में ही समाप्त हो गया।
भ्रष्टाचार के कारण सत्ता गंवानी पड़ी ऐसा तो सुना गया है लेकिन भ्रष्टाचार न होने देने के कारण किसी को पद से हटाने की यह पहली घटना थी। दुःख की बात है कि इस काण्ड में जनसंघ के ही दो व्यक्ति सम्मिलित थे। बीच बचाव के लिए अटल बिहारी वाजपेई भी आए लेकिन असफल होकर लौट गए।१९६९ के बाद लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी ने सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लिया। लेकिन नागरी प्रचारिणी सभा, देवरिया जैसी संस्थाओं में अपने अंतिम समय तक सक्रिय रहे। वह सभा के आजीवन सदस्य थे।
पांच वर्ष पश्चात २७ फ़रवरी १९७४ में ६५ वर्ष की अवस्था में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। मोती लाल मार्ग, देवरिया स्थित अपने भवन में उन्होंने अंतिम सांस ली।
यह एक विचित्र संयोग है कि जिस दिन उनका देहान्त हुआ उसी दिन भारतीय जन संघ के देवरिया जनपद के प्रथम विधायक श्री भुलई भाई विधानसभा का चुनाव जीते। श्री लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी की शवयात्रा और श्री भुलई भाई की विजय यात्रा एक ही दिन निकली।
नींव के पत्थर कभी दिखाई नहीं देते। लेकिन अगर नींव के पत्थर न हों तो भवन कभी खड़ा नहीं रह सकेगा। आज २०२३ में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी [ पूर्ववर्ती जन संघ ] के २५५ विधायक हैं। लोकसभा में ३०१ और राज्यसभा में ९४ सांसद हैं। १५ प्रांतों में भाजपा सत्ता में है। इस विराट सफलता के पीछे लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी तथा उनके जैसे अनेक कार्यकर्ताओं की साधना और तपस्या है। नई पीढ़ी इससे अनभिज्ञ है। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन भारतीय जनसंघ [ वर्तमान भाजपा ] का इतिहास ऐसे व्यक्तियों से भरा पड़ा है। 
साधना का दीप ले निष्कम्प हाथों
बढ़ रहे निज ध्येय पथ साधक निरंतर।।
मातृभूमि अखण्ड होगी , कण्टकों से शून्य होगी,
संगठित सामर्थ्य की कर गर्जना ,
जगत को ललकारते साधक निरंतर 
शुद्ध हृदय की थाली में विश्वास दीप निष्कंप जला कर,
कोटि-कोटि पग बढ़े जा रहे तिल तिल जीवन गला गला कर।।
आज लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी का जीवन गल कर समाप्त हो चुका है। लेकिन भारतीय जनसंघ [ वर्तमान भाजपा ] के इतिहास में उनका नाम नींव के पत्थर के रूप में सदा अंकित रहेगा।
प्रारंभिक काल खंड : १९०८ से १९३० [ २२ वर्ष ]
गोरखपुर काल खंड : १९३० से १९५२ [ २२ वर्ष ]
देवरिया काल खंड   : १९५२ से १९७४ [ २२ वर्ष ]