संस्मरण

संस्मरण – १
 

बहुत याद आते हैं लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी

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लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी आध्यात्मिक इंसान थे। मानवतावादी थे। देशभक्त मज़लूमों की तकलीफ़ों को देख नहीं पाते थे। न्यायालय में उनके यह गुण दिखाई पड़ते थे। उनकी जिरह और बहस सुनते हुए अधिवक्ता गम्भीर हो जाते थे। चतुर्वेदी जी दीवानी और फ़ौजदारी के मामलों के माहिर वकील और जाने-माने राजनीतिक व्यक्ति रहे। जीवन पर्यन्त आर एस एस और जनसंघ के सच्चे सेवक रहे।
 
जब मैं युवावस्था में देवरिया एक शिक्षक होकर मारवाड़ी कॉलेज में आया तो उनकी योग्यता के वशीभूत होकर एवं प्रसिद्धि के कारण उनसे मिले बिना रह नहीं सका। नज़दीक सम्पर्क में आ गया तो उनकी सपाट इंसानियत और ख़ुशमिज़ाजी से चतुर्वेदी जी का अनुगामी हो गया। एक बार चैम्बर में बैठा था तो वह कुछ फ़ाइलें पढ़ रहे थे। जूनियर से बोले, “ऐ देवी, उस किताब को निकालो और फ़लां पेज दिखाओ।” मामले का विवरण व धाराएं मिल गईं। देवी कोई और नहीं देवी प्रसाद सिंह थे। जो कालांतर में भाजपा के राज्य सभा सांसद बने।
 
कर्तव्यनिष्ठ चतुर्वेदी जी बिना किसी भेद भाव वाले, सरल आदमी के मित्रों में पं० परशुराम तिवारी, अच्युतानंद मिश्र, राजेन्द्र किशोर शाही तथा श्रीनारायण “भुलई भाई” के नाम याद आ रहे हैं। ऐसे विलक्षण स्मरण शक्ति वाले सरल आदमी कम होते हैं। एक बार शाम को उनके साथ बैठा था। हाल समाचार पूछने के दौरान उन्होंने कहा, “गोरे जी, आप अंग्रेज़ी और हिंदी अच्छा पढ़ाते हैं। छात्र आपकी तारीफ़ करते हैं। आप समाचार कब और कैसे लिखते हैं?” उत्तर दिया और कहा, “यह मेरी अभिरुचि है। समाचार तो चारों ओर मिलते हैं। दिमाग़ में ख़बरें बैठती जाती हैं। तहक़ीक़ात कर लेता हूं। रात में लिख कर सवेरे मैटर लिफ़ाफ़े में भर कर भेज देता हूं। पत्रकारिता में सच्चाई, ज़रा सी निर्भीकता होना जरूरी है।”
 
चतुर्वेदी जी की वह घटना भुलाई नहीं जा सकती जब एक विश्वासी मित्र ने उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करा दिया। अल्पमत में आते ही चतुर्वेदी जी ने तुरंत अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
 
श्रीचन्द गोरे
शिक्षक – पत्रकार
रेमण्ड शाप स्ट्रीट, भीखमपुर रोड
देवरिया
 
फ़ोन : 9455582340
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संस्मरण – 2
 
कविता रूप संस्मरण
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घूम घूम कर दिया जलाया “दीपक” का
अंधकार में दिया जलाया “दीपक” का
लक्ष्मी कान्त जी देवरिया के “कमल” हो गए
गली-गली झंडा फहराया “दीपक” का
“दो बैलों की जोड़ी” जब थी तब तो आप थे
“दीपक” की लौ बुझ ना जाए तब तो आप थे
देवरिया की नगर पालिका धन्य हुई थी
पहली बार सजा सिंहासन “दीपक” का
 
सरोज कुमार पाण्डेय 
कवि – लेखक 
देवरिया 
 
फ़ोन : 9452698878
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संस्मरण – 3
 
पण्डित लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी और मेरे पिता 
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सन १९६७ की मेरे बचपन की एक घटना मुझे आज भी विस्मृत नहीं होती है। जब एक जुलूस मेरे घर के सामने से जा रहा था। मेरे पिता पं० वेनी माधव तिवारी जो उस समय बुख़ार से पीड़ित थे तथा बिस्तर पर लेटे थे अचानक बिस्तर से उठे और जुलूस में शामिल हो गए। बाद में पता चला भारतीय जनसंघ से देवरिया नगर पालिका के चेयरमैन हुए पं० लक्ष्मी कान्त चतुर्वेदी जी का वह विजय जुलूस था।
 
पण्डित लक्ष्मी कान्त जी उस समय देवरिया में जनसंघ के सबसे प्रमुख लोगों में से थे। श्री चतुर्वेदी जी अच्छे वकील, अच्छे सामाजिक व्यक्ति के अलावा श्रेष्ठ साहित्यिक रुचि रखने वाले व्यक्ति भी थे।
 
मेरे पिता जो उस समय के प्रसिद्ध वकील श्री विश्वनाथ पाण्डेय के सहयोगी के रूप में अपने वकालत जीवन का आरम्भ कर रहे थे, माननीय भाऊराव देवरस के सम्पर्क में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय हो गए। १९५२ में श्री नाना जी देशमुख के कहने पर जनसंघ में भी सक्रिय भागीदारी करने लगे। मेरे पिता संघ की जो भी पत्रिकाएं निकलती थीं जैसे ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’, ‘आर्गेनाइज़र’ आदि तथा इसके अलावा आचार्य चतुरसेन और गुरुदत्त के उपन्यासों के भी नियमित पाठक थे।
 
मेरे पिता श्री लक्ष्मी कान्त जी के यहां लगभग प्रतिदिन बैठते थे। इन बैठकों में इन पत्र – पत्रिकाओं व उपन्यासों के विषय में चर्चा भी होती थी। यह बात चतुर्वेदी परिवार के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने मुझे एकबार बताया था।
 
कभी उपहास का पात्र रही पार्टी जनसंघ ऐसे ही कार्यकर्ताओं, जिन्होंने अपना जीवन एक दिये की लौ की भांति जलाया और जलाकर समाप्त कर दिया, के बल पर आज भाजपा के रूप में सशक्त भारत के निर्माण में लगी है।
 
लक्ष्मी कान्त तिवारी
देवरिया
 
फ़ोन: 9838936195
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संस्मरण – 4
 
तीर्थ स्वरूप महान मनीषी के श्री चरणों में दो शब्द रूपी पुष्प समर्पित 
 
स्मृतियों के झांकते झरोखों से बोझिल मन का हृदयस्पर्शी नमन, वंदन  अभिनंदन एवं श्री चरणों में प्रणाम 
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प्रेमी बन्धुओं,
 
आज मुझे स्वर्गीय श्री लक्ष्मी कांत चतुर्वेदी जी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर कुछ लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं हृदय से आभारी हूं माननीय कमल नयन चतुर्वेदी जी का जिन्होंने मुझे उत्साहित करते हुए संस्मरण लेखन का दायित्व दिया है।
 
वैसे तो पंडित लक्ष्मी कांत चतुर्वेदी जी हमारे थे ही लेकिन आज भी उनकी उपस्थिति दिखती है। क्या संयोग है कि लक्ष्मी कांतम् कमल नयनम् की सार्थकता सिद्ध होती नज़र आ रही है।
 
पंडित लक्ष्मी कांत जी मेरे पूज्य पिता जी के मामा जी रहे। वही स्नेह, वही प्यार, वही अपनापन, कुछ नूतन लिए हुए हम सभी के बीच कई भाषाओं के ज्ञाता माननीय कमल नयन चतुर्वेदी जी एक पुत्र होने का अपना दायित्व निभा रहे हैं। आज के इस भौतिक युग में पिता के नाम को जीवित रखने हेतु अनेकानेक पुस्तकों द्वारा, पत्रिका द्वारा, नगर के सम्भ्रांत लोगों की उपस्थिति में सुंदर एवं मार्गदर्शन देने वाले अनुकरणीय कार्यक्रम का आयोजन करते हुए अहर्निश लगे हुए हैं। इनके भगीरथ प्रयासों की मैं सराहना करता हूं। पुत्र दायित्व का ठीक से निर्वहन करने हेतु मैं उन्हें हृदय से साधुवाद देता हूं।
 
आलोचक व विघ्नसंतोषी पंडित लक्ष्मी कांत जी को जो भी मानें लेकिन मेरा मानना है कि या तो वे पंडित जी के निकट नहीं रहे होंगे या फिर स्वभावतः ऐसा कहने-सुनने के अभ्यस्त होंगे।
 
मेरे पूज्य पिता जी ने इलाहाबाद/गोरखपुर में वकालत करने के पश्चात 15 मार्च 1948 से देवरिया में वकालत आरम्भ किया। वहीं पंडित लक्ष्मी कांत जी ने 1952 में देवरिया में वकालत आरम्भ किया। आज देवरिया  के अनेक वरिष्ठ अधिवक्ता, जो संघ या भाजपा में हैं, इन्हीं के बनाए हुए हैं।
 
4 जुलाई 1956 की बात है जब पूज्य पिता जी और माननीय चतुर्वेदी जी एक साथ सोनबरसा जा रहे थे। उन्होंने देखा कि क़साई 200 गायों को वध के लिए बिहार लेकर जा रहे हैं। पंडित लक्ष्मी कांत जी क्रोधित में तमतमा उठे और वहीं पर रुक गए। तभी संयोगवश देवरिया के तत्कालीन परगनाधिकारी श्री ज़ैदी साहब सलेमपुर में मिल गए। उनके सुझाव पर पुलिस अधिकारी से सम्पर्क कर कहा कि यदि गायों को वध के लिए ले जाया गया तो जनता में बग़ावत हो जाएगी। पहली और अंतिम बार माननीय चतुर्वेदी जी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट [ FIR ] दर्ज करा कर, सभी गायों को मुक्त करा कर पूज्य संत योगिराज देवरहा बाबा के आश्रम पर भेजवाया।
 
माननीय लक्ष्मी कांत जी चतुर्वेदी गौशालाओं एवं गौरक्षा के कार्यों में बड़ी रुचि रखते थे। दिल्ली में जब गोहत्या बन्दी हेतु प्रदर्शन हुआ तो उसमें गोरखपुर मण्डल का नेतृत्व करते हुए गिरफ्तारी दी और दिल्ली के तिहाड़ जेल में फिर पंजाब के फ़िरोज़पुर जेल में बंद भी रहे। 
 
कई संस्कृत पाठशालाओं से सम्बंधित होने के कारण संस्कृत भाषा एवं संस्कृत के विद्वानों के प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। पूज्य देवरहा बाबा के आश्रम पर महान विद्वान माननीय सातवलेकर जी का भव्य स्वागत समारोह आपके द्वारा सम्पन्न हुआ था।
 
इस प्रकार जीवन के अंत तक उनमें राष्ट्र भाव बना रहा। सबको अपना स्नेह देते रहे। सबसे सम्मान पाते रहे।
 
बाल्यकाल में अपने पिता जी के साथ आपके घर जाया करता था। दशहरे का मेला मैं उन्हीं के घर से देखा करता था। 
 
कभी समय था जब समाज संघ / जनसंघ को हेय दृष्टि से देखा करता था। उन विपरीत परिस्थितियों में भी मेरा परिवार एवं पंडित लक्ष्मी कांत जी का परिवार संघ एवं संघ के पदाधिकारियों के प्रवास का स्थान हुआ करता था। विपरीत धारा एवं समय में भी अडिग रहते हुए संघ रूपी इस वटवृक्ष का सिंचन हुआ। मेरे संज्ञान में है कि इतना संघर्ष और त्याग करते हुए भी इस परिवार ने कभी ” रिटर्न ” की अपेक्षा नहीं रखी। 
 
दुर्भाग्य है कि लोगों ने स्वर्गीय लक्ष्मी कांत चतुर्वेदी जी को समझने में देरी कर दी।
 
श्रद्धा के साथ चरणों में निवेदित
 
केशवानन्द तिवारी ” श्यामू जी “
नई कालोनी
देवरिया
9889299869