तीर्थ स्वरूप महान मनीषी के श्री चरणों में दो शब्द रूपी पुष्प समर्पित
स्मृतियों के झांकते झरोखों से बोझिल मन का हृदयस्पर्शी नमन, वंदन अभिनंदन एवं श्री चरणों में प्रणाम
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प्रेमी बन्धुओं,
आज मुझे स्वर्गीय श्री लक्ष्मी कांत चतुर्वेदी जी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर कुछ लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं हृदय से आभारी हूं माननीय कमल नयन चतुर्वेदी जी का जिन्होंने मुझे उत्साहित करते हुए संस्मरण लेखन का दायित्व दिया है।
वैसे तो पंडित लक्ष्मी कांत चतुर्वेदी जी हमारे थे ही लेकिन आज भी उनकी उपस्थिति दिखती है। क्या संयोग है कि लक्ष्मी कांतम् कमल नयनम् की सार्थकता सिद्ध होती नज़र आ रही है।
पंडित लक्ष्मी कांत जी मेरे पूज्य पिता जी के मामा जी रहे। वही स्नेह, वही प्यार, वही अपनापन, कुछ नूतन लिए हुए हम सभी के बीच कई भाषाओं के ज्ञाता माननीय कमल नयन चतुर्वेदी जी एक पुत्र होने का अपना दायित्व निभा रहे हैं। आज के इस भौतिक युग में पिता के नाम को जीवित रखने हेतु अनेकानेक पुस्तकों द्वारा, पत्रिका द्वारा, नगर के सम्भ्रांत लोगों की उपस्थिति में सुंदर एवं मार्गदर्शन देने वाले अनुकरणीय कार्यक्रम का आयोजन करते हुए अहर्निश लगे हुए हैं। इनके भगीरथ प्रयासों की मैं सराहना करता हूं। पुत्र दायित्व का ठीक से निर्वहन करने हेतु मैं उन्हें हृदय से साधुवाद देता हूं।
आलोचक व विघ्नसंतोषी पंडित लक्ष्मी कांत जी को जो भी मानें लेकिन मेरा मानना है कि या तो वे पंडित जी के निकट नहीं रहे होंगे या फिर स्वभावतः ऐसा कहने-सुनने के अभ्यस्त होंगे।
मेरे पूज्य पिता जी ने इलाहाबाद/गोरखपुर में वकालत करने के पश्चात 15 मार्च 1948 से देवरिया में वकालत आरम्भ किया। वहीं पंडित लक्ष्मी कांत जी ने 1952 में देवरिया में वकालत आरम्भ किया। आज देवरिया के अनेक वरिष्ठ अधिवक्ता, जो संघ या भाजपा में हैं, इन्हीं के बनाए हुए हैं।
4 जुलाई 1956 की बात है जब पूज्य पिता जी और माननीय चतुर्वेदी जी एक साथ सोनबरसा जा रहे थे। उन्होंने देखा कि क़साई 200 गायों को वध के लिए बिहार लेकर जा रहे हैं। पंडित लक्ष्मी कांत जी क्रोधित में तमतमा उठे और वहीं पर रुक गए। तभी संयोगवश देवरिया के तत्कालीन परगनाधिकारी श्री ज़ैदी साहब सलेमपुर में मिल गए। उनके सुझाव पर पुलिस अधिकारी से सम्पर्क कर कहा कि यदि गायों को वध के लिए ले जाया गया तो जनता में बग़ावत हो जाएगी। पहली और अंतिम बार माननीय चतुर्वेदी जी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट [ FIR ] दर्ज करा कर, सभी गायों को मुक्त करा कर पूज्य संत योगिराज देवरहा बाबा के आश्रम पर भेजवाया।
माननीय लक्ष्मी कांत जी चतुर्वेदी गौशालाओं एवं गौरक्षा के कार्यों में बड़ी रुचि रखते थे। दिल्ली में जब गोहत्या बन्दी हेतु प्रदर्शन हुआ तो उसमें गोरखपुर मण्डल का नेतृत्व करते हुए गिरफ्तारी दी और दिल्ली के तिहाड़ जेल में फिर पंजाब के फ़िरोज़पुर जेल में बंद भी रहे।
कई संस्कृत पाठशालाओं से सम्बंधित होने के कारण संस्कृत भाषा एवं संस्कृत के विद्वानों के प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। पूज्य देवरहा बाबा के आश्रम पर महान विद्वान माननीय सातवलेकर जी का भव्य स्वागत समारोह आपके द्वारा सम्पन्न हुआ था।
इस प्रकार जीवन के अंत तक उनमें राष्ट्र भाव बना रहा। सबको अपना स्नेह देते रहे। सबसे सम्मान पाते रहे।
बाल्यकाल में अपने पिता जी के साथ आपके घर जाया करता था। दशहरे का मेला मैं उन्हीं के घर से देखा करता था।
कभी समय था जब समाज संघ / जनसंघ को हेय दृष्टि से देखा करता था। उन विपरीत परिस्थितियों में भी मेरा परिवार एवं पंडित लक्ष्मी कांत जी का परिवार संघ एवं संघ के पदाधिकारियों के प्रवास का स्थान हुआ करता था। विपरीत धारा एवं समय में भी अडिग रहते हुए संघ रूपी इस वटवृक्ष का सिंचन हुआ। मेरे संज्ञान में है कि इतना संघर्ष और त्याग करते हुए भी इस परिवार ने कभी ” रिटर्न ” की अपेक्षा नहीं रखी।
दुर्भाग्य है कि लोगों ने स्वर्गीय लक्ष्मी कांत चतुर्वेदी जी को समझने में देरी कर दी।
श्रद्धा के साथ चरणों में निवेदित
केशवानन्द तिवारी ” श्यामू जी “
नई कालोनी
देवरिया
9889299869