लक्ष्मीकांतजी का जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में १९५९ का अध्यक्षीय भाषण

प्रतिनिधि बन्धुओं, देवियों तथा सज्जनों

बरेली नगर में होने वाले प्रादेशिक सम्मेलन में मैं आप सभी लोगों का स्वागत करता हूं। आपने आगामी वर्ष के लिए भी पुनः प्रादेशिक प्रधान चुनकर मेरे प्रति जो विश्वास प्रकट किया है उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जो स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहास का एक अत्यंत तनावपूर्ण समय है। साम्यवादी लाल चीन ने अपनी साम्राज्य विस्तार की लिप्सा को पूर्ण करने के लिए भारत वर्ष को ही अबकी अपना लक्ष्य बनाया है और भारत के उत्तर-पूर्व, उत्तर तथा कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में आक्रमण कर दिया है। ऐसे समय में अमरीकी राष्ट्रपति का शान्ति के अग्रदूत के रूप में हमारे देश में आना एक शुभ लक्षण है। हम उनका स्वागत करते हैं।
एक पड़ोसी मित्र राष्ट्र द्वारा भारत पर आक्रमण इस युग की अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण दुर्घटना है। भारतीय जनसंघ ने १९५७ में तिब्बत को लाल चीन द्वारा उदरस्थ किए जाने के बाद अपने चुनाव घोषणा पत्र में यह आशंका व्यक्त की थी कि लाल चीन के इरादे भारत के प्रति अच्छे नहीं हैं और लाल चीन भारत पर आक्रमण कर सकता है किन्तु उस समय हमारे शासक वर्ग ने जनसंघ की इस चेतावनी के प्रति ध्यान नहीं दिया। जनसंघ की राजनैतिक भविष्यवाणी आज सत्य सिद्ध हुई है।
इस चीनी आक्रमण के लिए भी हमारे शासक गण और मुख्यतः हमारे प्रधानमंत्री उत्तर दायी हैं। किन्हीं दो बड़े देशों के मध्य तिब्बत जैसा एक buffer राष्ट्र का होना आवश्यक है और ईश्वर की कृपा से चीन और भारत के बीच एक ऐसा buffer राष्ट्र – तिब्बत मौजूद भी था। किन्तु तिब्बत के विषय में हमारे प्रधानमंत्री ने जिस राजनैतिक अदूरदर्शिता, अज्ञानता, अनुभवहीनता का परिचय दिया है वह किसी भी शासक के लिए क्षम्य नहीं हो सकता। चीन द्वारा तिब्बत को उदरस्थ करने का विरोध न करके हमारे शासकों ने केवल मानवता की हत्या नहीं की है किन्तु भारत की सुरक्षा को भी सदैव के लिए ख़तरे में डाल दिया है। सम्पूर्ण तिब्बत जाति का अस्तित्व संदिग्ध हो गया है। क्योंकि लाल चीन तिब्बती जाति को दुनिया के पर्दे से मिटा देने को कृत संकल्प है। यदि हम मानवता के प्रश्न को छोड़ दें तो राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से तिब्बत के अस्तित्व के अस्तित्व को मिटा देने में सहायता देकर हमने बड़ी भारी भूल की है। जब तक हमारी और तिब्बत की सीमाएं मिली हुई थीं तब तक हमें कोई कष्ट नहीं हुआ; किन्तु तिब्बत के स्वतंत्र अस्तित्व के मिटाने के बाद जब से हमारी व चीन की सीमाएं मिली हैं तब से हम पर आक्रमण भी हो गया है और हमारी सुरक्षा भी ख़तरे में पड़ गई है।
पाकिस्तान को बनाकर सीमा सम्बन्धी सतत झगड़े तो हमारे कांग्रेसी नेताओं ने पैदा ही किए थे, अब चीन की मैत्री पंचशील के नारे के द्वारा हमारे प्रधानमंत्री ने न केवल सीमा विवाद ही पैदा किए हैं अपितु ५००० वर्ग मील से अधिक भूमि चीनी आक्रांताओं के अधिकार में होने दी है।

इस संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि इस चीनी आक्रमण को जनता से बहुत दिनों तक छिपाया गया और संभवतः अपनी विदेशी नीति की असफलता को छिपाने के लिए ही हमारे प्रधानमंत्री भी चीनी आक्रमण को जनता से छुपाने का प्रयत्न करते रहे। अपने सुरक्षा मंत्री का संदिग्ध व्यक्तित्व भी राष्ट्र के लिए चिन्ता का विषय है और उचित तो यह है कि ऐसे समय में कोई ऐसा व्यक्ति सुरक्षा मंत्री के पद पर हो जिस पर राष्ट्र का पूर्ण विश्वास हो। किन्तु हमारे प्रधानमंत्री अपने हठी स्वभाव के कारण तथा अपनी मित्रता निभाने के हेतु सुरक्षा मंत्री को हटाने की बात तो दूर रही उनको राष्ट्रभक्ति का प्रमाण पत्र दे रहे हैं। इस प्रकार के प्रमाण पत्र पहले भी हमारे प्रधानमंत्री अनेक व्यक्तियों को देते रहे हैं। शेख़ अब्दुल्ला का भी काण्ड जनता को भूला नहीं होगा। स्थिति यह है कि आज पं० नेहरू की सारी विदेश नीति बुरी तरह केवल असफल ही नहीं हुई वरन राष्ट्र के लिए घातक तथा हानिकर भी सिद्ध हुई है और यह विधि की विडम्बना ही कहनी चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री जो अपनी विदेश नीतियों में सदा असफल रहे है आज भी प्रधानमंत्री पद पर बने हुए हैं।

चीनी आक्रमण के साथ हमारा ध्येय अपने देश के उन भाइयों की ओर जाता है जिन्हें हम कम्युनिस्ट कहते हैं। विदेशी आक्रमण का खुल्लम खुल्ला समर्थन तथा पक्षपात करना और अपने ही राष्ट्र के प्रति घातक कारवाई करना इनका स्वभाव बन गया है और आश्चर्य तो तब होता है कि जब ये अपनी इन हरकतों पर पश्चात्ताप तथा लज्जा का अनुभव करना तो दूर रहा वरन उल्टे भारत में भारत विरोधी प्रचार करने की धृष्टता निरन्तर कर रहे हैं। जनता को धोखा देने के लिए आपस में भेदभाव का प्रदर्शन करना तथा अपनी एक नीति को प्रति दूसरे दिन बदलने की घोषणा करना भी इनका स्वभाव सा बन गया है। चीनी आक्रमण के समय राष्ट्र का ध्यान उधर से हटाने के लिए भीतरी अशांति पैदा करने जैसा घृणित व्यवहार करने में किंचित मात्र भी हिचकिचाहट का अनुभव नहीं करते।इस पार्टी ने देश में जयचंदों की परम्परा का निर्माण कर दिया है और थोड़े दिनों से जनता को भी चीन के प्रति अनुरक्त बनाने के हेतु उन्होंने जिहाद छेड़ दिया है और राष्ट्र विरोधी प्रचार में योजना पूर्वक संलग्न हो गए हैं। क्या ऐसी पार्टी को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ देश में विध्वंसकारी तथा अराजकता पूर्ण वातावरण निर्माण करने के लिए योजना पूर्वक कार्य करते रहने देना राष्ट्र के लिए हितकर होगा?

हमारे सामने वाह्य आक्रमण तथा आन्तरिक ख़तरे का ही संकट नहीं है अपितु हमारी आर्थिक समस्याएं भी दिन ब दिन उलझती जा रही हैं। प्रथम पंचवर्षीय योजना तथा द्वितीय पंचवर्षीय योजना के प्रायः बीतने पर भी हमारी कृषि समस्या हल नहीं हुई है। देश खाद्यान्नों में आत्म-निर्भर नहीं हुआ है। मंहगाई अपनी चरम सीमा पर है सरकार द्वारा ग़ल्ला व्यापार भी नहीं सफल हुआ और इसमें सरकार ने स्वयं भी असफलता स्वीकार की है। खाद्य मंत्री अजित प्रसाद जैन का त्यागपत्र सरकार की खाद्य नीति की असफलता का स्पष्ट प्रमाण है किन्तु उस असफलता के कारणों की ओर आज भी सरकार दुर्लक्ष्य कर रही है और उसे छिपाने के लिए सहकारी खेती का नारा बुलन्द कर रही है। सहकारी खेती देश के लिए हानिकारक होगी इसके विषय में जनसंघ ने बहुत पहले ही अपना मत व्यक्त कर दिया है। यदि सहकारी खेती देश पर लादी गई तो उसके निम्नलिखित परिणाम होंगे जो देश के लिए हानिकर होंगे
 
१- उपज निश्चय घटेगी।
२- बेकारी बढ़ेगी।
३- नौकरशाही के चंगुल में किसान अधिकाधिक फंसता चला जाएगा; जिसमें किसान की स्वतंत्रता नष्ट होगी।
 
प्रजा समाजवादी :- समाजवादी तथा कम्युनिस्ट प्रभृति पार्टियां सहकारी खेती के प्रश्न पर कांग्रेस के साथ हैं। यदि व्यवहार में कहीं कुछ विरोध भी है तो सिद्धांत में कोई विरोध नहीं है। जनसंघ ने गांव में जाकर सहकारी खेती के विरोध में संघर्ष समितियों के निर्माण करने तथा जनता को इसकी हानियों से शिक्षित करने की योजना बना कर इस दिशा में कुछ काम किया है।
इस समय मंहगाई अपनी चरम सीमा पर है। करों का बोझ जनता पर अत्यधिक बढ़ गया है। जीवन की अत्यंत आवश्यक वस्तुओं पर भी कर का भार अत्याधिक है। और अभी बढ़ता ही जा रहा है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार भी कांग्रेस राज्य में जिस तीव्र गति से बढ़ा है वैसा जीवित मनुष्यों के समय में कभी नहीं था। शासन का व्यय अत्याधिक बढ़ा दिया गया है। जनता की गाढ़ी कमाई जो सरकार करों के रूप में वसूल कर रही है उनका दुरुपयोग हो रहा है। इतने भ्रष्टाचार के होते हुए हमारे शासकों का ध्यान भ्रष्टाचार हटाने की ओर नहीं जाता जैसे कि भ्रष्टाचार शासन की सामान्य स्थिति है भ्रष्टाचार, ब्लैक मार्केट, जातिवाद, भाषावाद, प्रांतवाद इत्यादि वादों से दूर करने की ओर ध्यान न देकर चाटुकारिता के प्रश्न हमारे शासक पैदा करते हैं। जैसे ” नेहरू के बाद कौन? ” अथवा नेहरू एक वटवृक्ष के समान है जिसके नीचे आश्रय बहुत व्यक्ति पा सकते हैं किन्तु कोई पनप नहीं सकता। ऐसे प्रश्न चाटुकारिता नहीं तो और क्या है? हमारे प्रधानमंत्री नेहरू की नीति, चाहे वह कश्मीर के प्रश्न पर हो , चाहे पाकिस्तान के सम्बन्ध में हो, या तिब्बत के, चाहे चीन के सम्बन्ध में हो, या गोवा के प्रश्न पर हो सर्वथा असफल सिद्ध हुई है। क्या शासन की दृष्टि से प्रधानमंत्री जैसे असफल व्यक्ति को सफलता का जामा पहिनाना चाटुकारिता नहीं है? गांधी जी के महाप्रयाण के बाद क्या भारत का काम नहीं चल रहा है? शायद पं० नेहरू के सबसे बड़े चापलूस भी उन्हें गांधी जी से बड़ा कहने की हिम्मत अभी नहीं कर सकते। अस्तु यदि गांधी जी के बाद भी भारत का काम चल रहा है तो नेहरू के बाद भी चलेगा और शायद इस समय से कहीं ज़्यादा सुन्दर रूप से चले। स्वर्गीय श्री रफ़ी अहमद किदवई ने ऐसे ही एक चाटुकारिता के प्रश्न का उत्तर देते समय कहा था कि वह प्रधानमंत्री का काम इतनी अधिक सुन्दरता से कर सकते हैं कि जितना उस काम को देखकर शायद पं० नेहरू को भूल जायें।
प्रथम पंचवर्षीय योजना समाप्त हुई , दूसरी पंचवर्षीय योजना समाप्त प्राय है, तीसरी की चर्चा प्रारंभ है। पंचवर्षीय योजनाओं के बीतने पर भी साधारण जन की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। वरन लोगों का जीवन अत्यंत संघर्षमय तथा कष्टमय बनता जा रहा है । बेकारी बढ़ती जा रही है। किसी योजना के प्रति जनता का उत्साह नहीं है। हमारी पंचवर्षीय योजनाएं अत्यंत महत्वाकांक्षी तथा अव्यवहारिक हैं।
प्रथम पंचवर्षीय योजना समाप्त हुई , दूसरी पंचवर्षीय योजना समाप्त प्राय है, तीसरी की चर्चा प्रारंभ है। पंचवर्षीय योजनाओं के बीतने पर भी साधारण जन की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। वरन लोगों का जीवन अत्यंत संघर्षमय तथा कष्टमय बनता जा रहा है । बेकारी बढ़ती जा रही है। किसी योजना के प्रति जनता का उत्साह नहीं है। हमारी पंचवर्षीय योजनाएं अत्यंत महत्वाकांक्षी तथा अव्यवहारिक हैं।
यह अधिवेशन वाराणसी अधिवेशन के केवल आठ माह के बाद हो रहा है। इस समय के अंतर्गत हमें अपनी संगठनात्मक स्थिति का भी सिंहावलोकन करना उपयोगी होगा। इसी वर्ष पांच महानगर पालिकाओं के चुनाव हुए। इसमें दलीय दृष्टि से जनसंघ का स्थान द्वितीय रहा अर्थात कांग्रेस प्रथम और जनसंघ द्वितीय। लखनऊ में जनसंघ का स्थान प्रथम रहा और कांग्रेस की अपेक्षा जनसंघ के जीते हुए प्रत्याशियों की संख्या दूनी रही। इस चुनाव में जनसंघ को जितना समर्थन मिला है तथा जितनी इसने लोकप्रियता प्राप्त की है उससे हमारी जिम्मेदारियां बहुत बढ़ गई हैं। भविष्य में हम इससे अधिक लोकप्रियता और समर्थन प्राप्त करें यही हमारा प्रयत्न होना चाहिए।
हमारी शक्ति सीमित है और हमारे पास धनाभाव है किन्तु हमें अपने ध्येय में निष्ठा तथा जनता के समर्थन का बल प्राप्त है। अतएव हमें अधिकाधिक काम करने की तथा अपने संगठन को अधिक से अधिक व्यापक तथा सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है और इसके लिए अधिक से अधिक जन सम्पर्क रखने की जरूरत है। १९६२ के आम चुनाव को अब केवल दो वर्ष रह गए हैं। इतने समय में हम जितना अधिक अपने दल को संगठित करेंगे तथा जितना जन सम्पर्क स्थापित करेंगे हमारे लिए उतना ही लाभ होगा।
आम जनता भी समझने लगी है कि इस समय जनसंघ ही एक ऐसा दल है जो सही अर्थ में विरोधी दल कहा जा सकता है। प्रजा समाजवादी एवं समाजवादी दल कांग्रेस के विरोधी दल नहीं हो सकते क्योंकि इनका भी लक्ष्य और उद्देश्य वही है जो कांग्रेस का है। अर्थात समाजवाद की स्थापना। एक ही लक्ष्य, उद्देश्य तथा सिद्धांत के दल एक दूसरे के विरोधी नहीं हो सकते। महानगर पालिका के चुनाव में मतदाताओं ने जनसंघ को ही अपने मतदान द्वारा विरोधी दल प्रभावित किया है और सिद्धांतत: हम ही विरोधी दल की संज्ञा में आ सकते हैं। जनता हमको समर्थन देने के लिए तैयार है और हमसे अपेक्षा भी करती है कि हम विरोधी दल का स्थान लें किन्तु यदि हम अपने संगठन को अधिक व्यापक नहीं बना सकते और विरोधी दल का स्थान नहीं ले सकते तो यह दोष जनता का नहीं, यह दोष हमारा ही है।
आज देश में अन्य दल भी हमारे सिद्धांत और कार्यक्रम को अपनाते जा रहे हैं। उसमें सन्देह नहीं कि हमने ऐसी स्थिति का निर्माण किया है जिससे अन्य दलों को भी अपनी दलीय राजनीति में राष्ट्रीयता का सहारा लेने को बाध्य होना पड़ा है। भारतीय संस्कृति जैसे विषय का राजनीति में समावेश करने का श्रेय हम ही को है जिसका अन्य दल अब अनुकरण कर रहे हैं। कुछ दल तो जनसंघ के सिद्धांत और प्रस्तावों को अपनाने लगे हैं। जैसे भारत की आवश्यकता का विषय तथा भारत से विदेशी शासकों की मूर्तियों को हटाने का विषय अन्य दलों ने भारतीय जनसंघ से ही लिया। आज हम यदि अन्य दलों की तरफ़ देखें तो अधिकांश दल सिद्धांत विहीन हैं। तथा साम्प्रदायिकता का दोष हम पर मढ़ते हुए भी स्वयं साम्प्रदायिकता के रंग में रंगे हुए हैं। केरल में मुस्लिम लीग के साथ चुनाव समझौता क्या कांग्रेस और प्रजा समाजवादी पार्टी की साम्प्रदायिक मनोवृत्ति का परिचायक नहीं है? इसी तरह अभी हाल में प्रजा समाजवादी दल के मंत्री द्वारा दलगत स्वार्थों के वशीभूत होकर पंजाबी सूबे की मांग का समर्थन क्या उनके विघटनकारी प्रवृत्ति का परिचायक नहीं है? क्या किसी सम्प्रदाय विशेष के हितों की रक्षा की बात बार-बार दोहराना तथा ऐसा कहना कि अमुक सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व संख्या के अनुपात से कम लोक सभा तथा विधान सभाओं या नौकरियों में है अपनी साम्प्रदायिक मनोवृत्ति का परिचायक नहीं है? क्या लखनऊ के महानगर पालिका के चुनाव में कांग्रेस तथा प्रजा समाजवादी पार्टियों द्वारा मुसलमानों के मत खासतौर पर प्राप्त करने की चेष्टा साम्प्रदायिकता पर आधारित नहीं है? आज लखनऊ में आम चर्चा है कि लखनऊ की प्रजा समाजवादी पार्टी तथा मुस्लिम लीग में कोई भेद नहीं है। क्या जनसंघ की जीत से क्षुब्ध होना तथा जनसंघ को अपशब्द कहना श्री त्रिलोकी सिंह की साम्प्रदायिक मनोवृत्ति का परिचायक नहीं है? इन्हीं बातों का परिणाम यह हुआ कि देश में उन साम्प्रदायिक तत्वों ने फिर से सर उठाना प्रारम्भ कर दिये हैं जो देश में उपद्रव करने पर तुले हुए हैं। 
गत होली के समय और उसके आस-पास तथा मुहर्रम के अवसर पर किये गये उपद्रव इस बात के स्पष्ट प्रभाव है कि साम्प्रदायिक तत्व पुनः देश में सुनियोजित ढंग से गड़बड़ी फैला कर एक बार फिर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। देश में मुस्लिम लीग की पुनः उत्पत्ति राष्ट्रीय तत्वों के लिए एक गम्भीर चेतावनी है। जिसके कुकृत्य का परिणाम विभाजन के रूप में राष्ट्र भुगत चुका है। समय समय पर प्रधानमंत्री द्वारा तथाकथित मुस्लिम हितों की अनावश्यक चिंता के विचार व्यक्त किए जाने से साम्प्रदायिक मुस्लिम तत्वों को बल मिला है। देश में जमायतुल इस्लामी जैसी खतरनाक साम्प्रदायिक संस्थायें बराबर काम कर रही हैं किन्तु अधिकाधिक मुस्लिम साम्प्रदायिक संस्थाओं का जन्म होना हमारे लिए एक गम्भीर खतरा है। केरल प्रांत में मुस्लिम लीग के साथ चुनाव समझौता करके कांग्रेस व प्रजा समाजवादी दल ने एक अनुचित काम ही नहीं किया है अपितु मुस्लिम लीग की जड़ों को देश में मजबूत किया है।
कांग्रेस शासन के अन्तर्गत सुरक्षा विहीनता की भावना भी बढ़ती जा रही है। देहातों में चोरी व डकैती के डर से लोग अपने पास कुछ रख नहीं सकते। ट्रेनों की यात्रा निरापद नहीं रही। अभी हाल ही में ट्रेन के यात्रियों को लूटने के समाचार जो समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुए हैं उनसे किसी भी यात्री के मन में आतंक का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आपके इस नगर में ही दिन दहाड़े जिस प्रकार बैंक लूट कर डाकू भाग गए उससे नागरिकों के मन में भय का संचार होना स्वाभाविक है। किसी स्वतंत्र देश में ऐसी घटनाओं का होना शासन के लिए घोर कलंक की बात है। क्योंकि वह शासन कोई शासन नहीं है जिसमें जनता अपने को सुरक्षित न समझे। देहातों में खेत लूटने, खेतों को जानवरों से चराने और दूसरे के खेतों को जबरदस्ती काट लेने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। और यह देहातों के लिए स्वाभाविक रूप पकड़ती जा रही हैं। गुंडों की धृष्टता इस कारण बढ़ती जा रही है कि उनके ऊपर कोई रोक टोक नहीं है। पुलिस खेत काटने व चराने की घटनाओं की रिपोर्ट भी नहीं लिखती। और एक साधारण देहाती अपने को बिल्कुल अरक्षित समझ रहा है।
आप प्रत्येक हालत में जनसंघ की राजनैतिक भविष्यवाणी को सही पाएंगे। इसका कारण यह है कि जनसंघ के सिद्धांत तात्विक और उसकी विचारधारा सुस्पष्ट है। क्या कोई कह सकता है कि यदि जनसंघ ने आंदोलन न किया होता और अमर शहीद डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान न हुआ होता तो आज काश्मीर भारत का अंग रहता? जनसंघ के नेताओं ने काश्मीर के विषय में जो बात १९५२-५३ में कही यह बात हमारे प्रधानमंत्री तथा अन्य दलों की समझ में १९५७ में आई और जो काम बहुत पहले होना चाहिए था उसको अब धीरे-धीरे कार्यान्वित किया जा रहा है। हमने भारत के निशान, विधान व प्रधान को काश्मीर में लागू करने के बारे में आन्दोलन किया और आज हमें प्रसन्नता है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट की अधिकार सीमा २६ जनवरी सन् १९६० से जम्मू तथा काश्मीर में लागू होने जा रही है। उसी तरह से भाषावार प्रान्त रचना या पंचवार्षिक योजनाओं के विषय में भी भारतीय जनसंघ का दृष्टिकोण सही उतरा है और सहकारी खेती के विषय में भी जनसंघ का दृष्टिकोण सही है। यह समय बतलाएगा कि मार्क्स और ऐंगल्स के समाज शास्त्र पुराने हो चले हैं और इनको आज भी आधार शिला मानकर चलने वाली पार्टियां अपने को प्रगतिशील होने का दावा करती हैं यह केवल उनकी रूढ़िवादी मनोवृत्ति का परिचायक है। भारतीय जनसंघ ने पुरानी भारतीय नींव पर आधारित एक नवीन दृष्टिकोण जनता के सामने रखा है और जो समर्थन हमें मिल रहा है वह हमारे सिद्धांत के भारतीय एवं नवीन तथा अच्छे होने का प्रमाण है। किन्तु आजकल के युग में हम केवल अपने सिद्धांतों की अच्छाई पर भरोसा रख कर बैठ नहीं सकते। हमें एक सुसंगठित समाज बनाना पड़ेगा और इसके लिए हमें देहात और शहरों में घर घर जाकर अपना संदेश देना होगा। यदि हम ऐसा कर सके तो इसमें संदेह नहीं कि हमारा भविष्य उज्ज्वल है।
 
वन्दे मातरम्